Tuesday, November 6, 2018

छह महीने पहले हुआ अपहरण

भारत और अफ़ग़ानिस्तान की सरकारें अपहरण के छह महीने बाद भी इनका पता नहीं लगा सकी हैं. इस कारण इनके परिजन हताश हैं.
मुलिया देवी प्रसादी महतो की पत्नी हैं और वो महीनों से अपने पति के आने का इंतज़ार कर रही हैं. इनकी बेटी ने इसी साल दसवीं की परीक्षा पास की है. मुलिया देवी कहती हैं कि उनकी बेटी ने पढ़ाई छोड़ दी है.
मुलिया देवी कहती हैं, ''हमलोग ग़रीब हैं. मेरे पति इसलिए परदेस गए कि चार पैसा कमा कर बच्चों को ठीक से पढ़ाएंगे-लिखाएंगे. अब उनका पता ही नहीं चल रहा है. हमलोग कैसे ज़िंदा रहें. किस पर भरोसा करें. कौन वापस लाएगा मेरे पति को. अब तो पता ही नहीं चलता कि सरकार उन्हें छुड़ाने के लिए कुछ कर भी रही है या नहीं. मुझे मेरे पति से मिलवा दीजिए.''
प्रसादी महतो के गांव के ही संतोष रजक इस मसले पर मोदी सरकार ने निराश हैं. उनका कहना है कि सरकार अफ़ग़ानिस्तान पर दबाव नहीं बना पा रही है.
महुरी गांव के हुलास महतो अफ़ग़ानिस्तान में अगवा भारतीय मज़दूरों में से एक हैं. यहां उनकी पत्नी प्रमिला देवी की हालत ख़राब होती जा रही है. वो पति के ग़म में ठीक से खा-पी भी नहीं रही हैं. उन्होंने बताया कि बच्चे जब पापा के बारे में पूछते हैं, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता.
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपहरण के 40 दिन बाद अगवा किए गए मज़दूरों में से तीन की पत्नियों और प्रसादी महतो के बेटे से दिल्ली में मुलाक़ात की थी.
घाघरा गांव के प्रकाश महतो की पत्नी चमेली देवी उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थीं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि विदेश मंत्री ने एक महीने के अंदर सभी का पता लगा लेने का आश्वासन दिया था.
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी पिछले महीने इन मज़दूरों में से कुछ की पत्नियों से रांची में मुलाक़ात की थी. रघुवर दास ने इन्हें एक-एक लाख रुपए की मदद देने की घोषणा की थी, लेकिन यह पैसा अभी तक नहीं मिला है.
उनसे मिलने के बाद प्रमिला देवी ने बताया कि मुख्यमंत्री ने भी उनके अपहृत पति का पता जल्दी ही लगाने की बात कही थी, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ.
प्रवासी समूह के संचालक सिकंदर अली और बगोदर पश्चिम के मुखिया लक्ष्मण महतो ने बताया कि अफ़ग़ानिस्तान में अपहरण के बावजूद इस इलाक़े से मज़दूरों का पलायन नहीं रुका है. यहां बेरोज़गारी बड़ी समस्या है और लोग अभी भी अफ़ग़ानिस्तान जा रहे हैं.
ईरान के यज़्द शहर के रहने वाले साबेरी कहते हैं कि 'मेरे यहां पानी वाले एयर कंडिशनर भी हैं. मगर मुझे यहां, इस क़ुदरती एसी में बैठना पसंद है. ये मुझे पुराने दिनों की याद दिलाता है.'
साबेरी का इशारा बादगीर (हवा पकड़ने वाला) की तरफ़ है. हम उसी के साये तले बैठे हैं.
रेगिस्तान में बसे यज़्द शहर में भयंकर गर्मी पड़ती है. पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है.
इतने गर्म मौसम में चाय का ख़याल आना अजूबा ही होगा.
लेकिन बादगीर के हवादार आंगन में बैठने के बाद तपता सूरज भी मद्धम जान पड़ता है.
इतना आराम मिलता है कि अपने मेज़बान को अलविदा कहने का मन नहीं होता.
यहां बैठ कर आप जब आस-पास की चीज़ों को निहारते हैं, तब एहसास होता है कि इंसान ने इस गर्म माहौल में ख़ुद को सुकून देने की ये तकनीक हज़ारों बरस पहले ही ईजाद कर ली थी.
बादगीर यानी हवा पकड़ने वाले ये ढांचे चिमनी जैसे हैं, जो यज़्द और ईरान के रेगिस्तानी शहरों की पुरानी इमारतों के ऊपर दिखते हैं.
ये ठंडी हवा को पकड़ कर इमारत में नीचे की तरफ़ ले जाने का काम करते हैं. इनकी मदद से मकानों को भी ठंडा किया जाता है.
और उन चीज़ों को बचाने का काम भी होता है, जो गर्मी में ख़राब हो सकती हैं.
तमाम रिसर्च से साबित हुआ है कि बादगीर की मदद से तापमान को दस डिग्री सेल्सियस तक घटाया जा सकता है.
प्राचीन काल में फ़ारस से लेकर, मिस्र, अरब और बेबीलोन की सभ्यताओं तक, ऐसे आर्किटेक्चर को बनाने की कोशिश की गई जो मौसम की मार से बचा सके.
ऐसे ज़्यादाचर ढांचों को क़ुदरती तौर पर हवादार बनाने की कोशिश की गई.
बादगीरों या हवादार ढांचों की ऐसी मिसालें मध्य-पूर्व से लेकर मिस्र और भारत-पाकिस्तान तक देखी जा सकती हैं.
बादगीर, इमारतों के सबसे ऊंचे हिस्से में बने होते हैं. इसलिए इनकी देख-रेख बड़ी चुनौती होती है.
इनकी टूट-फूट का ख़तरा ज़्यादा होता है. ईरान की कई इमारतों के ऊपर बने ये ढांचे यानी बादगीर चौदहवीं सदी तक पुराने हैं.
फ़ारसी कवि नासिर ख़ुसरो की नज़्मों में भी बादगीर का ज़िक्र मिलता है. ये नज़्में तो डेढ़ हज़ार साल पुरानी हैं.
वहीं, मिस्र के लक्सर शहर में ईसा से 1300 साल पुरानी कुछ पेंटिंग मिली हैं.
इन चित्रों में भी बादगीर जैसी संरचनाएं देखने को मिलती हैं.
डॉक्टर अब्दुल मोनिम अल-शोरबागी सऊदी अरब के जेद्दा स्थित इफ़त यूनिवर्सिटी में आर्किटेक्चर और डिज़ाइन के प्रोफ़ेसर हैं.
डॉक्टर शोरबागी कहते हैं कि मध्य-पूर्व के देशों से लेकर, पाकिस्तान और सऊदी अरब तक बादगीर मिलते हैं.
ये इराक़ के अब्बासी ख़लीफ़ाओं के दौर के महलों की चौकोर इमारतों से मिलते-जुलते हैं.
ये महल इराक़ के उखैदर इलाक़े में आठवीं सदी में बनाए गए थे.
वैसे एक थ्योरी ये भी है कि बादगीर का विकास अरब देशों में हुआ. जब अरबों ने ईरान पर जीत हासिल की, तो उनके साथ ये फ़ारस भी पहुंचा.
यज़्द शहर की ज़्यादातर इमारतों पर बने ये बादगीर आयताकार हैं. चारों तरफ़ हवा आने के लिए खांचे बने हुए हैं.
लेकिन स्थानीय लोग बताते हैं कि छह और आठ मुंह वाले बादगीर भी मिलते हैं.
यज़्द की पुरानी इमारत में चलने वाले एक कैफ़े के कर्मचारी मोइन कहते हैं कि, 'बादगीर में हर दिशा से आने वाली हवा पकड़ने के लिए खांचे बने होते हैं. जबकि यज़्द से कुछ दूर स्थित क़स्बे मेबूद में सिर्फ़ एक तरफ़ खांचे वाले बादगीर मिलते हैं क्योंकि वहां तो एक ही तरफ़ से हवा आती है.'
बादगीर के ढांचे को ऐसे बनाया गया है जो वातावरण की हवा को खींचकर संकरे रास्तों से होते हुए नीचे की तरफ़ ले जाता है.
ठंडी हवा के दबाव से गर्म हवा इमारत के बाहर निकल जाती है.
इस हवा के निकलने के लिए बादगीर के उल्टी तरफ़ एक खिड़की जैसी जगह खोली जाती थी.
अगर ठंडी हवा नहीं भी बह रही होती, तो भी बादगीर गर्म हवा पर दबाव बनाकर उसे धकेल कर घर से बाहर निकालने का काम करता था.
इससे घर के भीतर ठंडक बनी रहती थी.

Wednesday, October 3, 2018

नोआखालीः जिसे महात्मा गांधी ने कभी श्मशान कहा था

केंद्र और यूपी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए वो कहते हैं, ''हमने क़र्ज़माफ़ी की. मोदी जी के नेतृत्व में काफी काम हुआ है. यूरिया की कालाबाज़ारी रुकी है. किसानों के लिए सरकार काफी गंभीर है. सालों से उपेक्षित पड़े किसानों को हमने राहत देने की कोशिश की है. किसानों को भारी राहत मिली है.''
कांग्रेस के रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट किया, ''लाठी गोली की है भरमार. किसानों से बर्बरता पूर्ण व्यवहार, बदलेंगी ऐसी मोदी सरकार!''
इस ख़बर को लिखे जाने तक कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह की तरफ से ट्विटर पर कोई ट्वीट नहीं किया गया है.
हालांकि गांधी जयंती और लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिन पर 'जय जवान, जय किसान' के ट्वीट कृषि मंत्री की फीड में देखे जा सकते हैं. की उम्र पार कर चुकीं हरियाणा की सोनबरी किसान यूनियन से हैं. वो कहती हैं, ''म्हारा कई महीने का पेमेंट रुक रहा है. बिजली का बिल घटाने की बजाय बढ़ा दिया. हम हटेंगे नहीं. दिल्ली जाए बिना मानेंगे नहीं. हर साल छूट मिलती थी, इस साल छूट भी नहीं मिली.''
किसान रैली में आए भूपेंद्र प्रधान कहते हैं, ''झूठ बोलने के अलावा कोई काम नहीं है. किसानों का शोषण करते हैं. हम इस सरकार को बिल्कुल पसंद नहीं करते. हम तो सरकार के भंडे कर देंगे.''
पंजाब से आए सुरजीत सिंह कहते हैं, ''मोदी सरकार ने जो वादे किए थे, वो पूरा नहीं किया. कर्जमाफी का वादा किया था, वो पूरा नहीं हुआ, पंजाब में हर रोज़ पांच किसानों की मौत होती है. गन्ना के बकाया तक नहीं चुकाया.''अपना हक लेकर रहेंगे' नारा लगाते इन किसानों की शिकायतों का अंबार रुकता नहीं है. जिला मुज़फ्फरनगर से आए मंजोत सिंह कहते हैं, ''ऐसी लुटाई वाली सरकार आज़ादी के बाद कभी नहीं आई. बिजली के बिल इतने बढ़ा दिए. यूपी का जो मुख्यमंत्री है, इनने ज़्यादा थका लिया. मोदी-योगी की जोड़ी है. बेइमान इकट्ठे हो रहे हैं.''
पास खड़े कई किसान भी कहते हैं, ''शांतिपूर्वक अपनी बात रखने आए थे. रबड़ की गोलियां चला रहे हैं, पानी की बौछार कर रहे हैं. अरे सीने पे गोली चला रहे हैं. बताओ. अपनी गाल बजाई में लगे रहे हैं. बीते चुनाव में इसी मोदी को वोट दिया था जिनको भाजपा भी लिखना नहीं आता था, उनको वोट दे देकर जिताया. अब आने दो 2019, सबक सिखा देंगे. इनका ऐसा बिगुल बजाएंगे कि याद रखेंगे.''
चार साल पहले देश में गांधी जयंती को स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ था. चार साल बाद इस अभियान की एक तस्वीर यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर किसान रैली से लौटते हुए मिलती है.
जहां स्वच्छ भारत अभियान स्टिकर के आस-पास किसानों के झंडे गिरे पड़े हुए हैं और पानी के टैंक से पानी पीते पुलिसवाले कहते हैं- अरे हम भी ड्यूटी कर रहे हैं और ये भी, कोई दुश्मन थोड़ी हैं. रात को हम भी घर चले जाएंगे और ये भी.
इसके बाद किसान नेताओं का और मैं इस पुलिसवाले का आश्वासन लेकर लौटने की ओर बढ़ चलते हैं.
बापू का बिहार के चंपारण से ख़ास रिश्ता रहा है. यहां आकर महात्मा गांधी ने जब सत्याग्रह शुरू किया तो तब इसका असर न केवल तत्कालीन राजनीति और समाज पर पड़ा बल्कि इसने अलग-अलग भाषाओं के लोकगीतों पर भी असर डाला.
पत्रकार निराला बताते हैं, "ये असर दो तरह से सामने आया. पारंपरिक लोकगीतों जैसे- विवाह गीत, सोहर, पुरबी, कजरी में महात्मा गाँधी शामिल होने लगे और दूसरा ये कि उस समय की लोकबोली के रचनाकार गांधी पर अलग-अलग तरीक़े से गीत लिखने लगे. ऐसा सिर्फ़ चंपारण की धरती पर नहीं हुआ, दूसरी बोलियों में भी हुआ. लोकगीतों की दुनिया में ऐसा ही होता है."
"उस दौर में भोजपुरी का यह गीत बहुत मशहूर हुआ, मोरे चरखा के टूटे न तार, चरखवा चालू रहे. गान्ही बाबा बनलै दुलहवा, अरे दुल्हिन बनी सरकार, चरखवा चालू रहे...."
"उस ज़माने में गांवों में यह मशहूर विवाह गीत बन गया था जिसमें गांधी जी को दूल्हा बनाया गया और अंग्रेज़ों को बाराती."
निराला कहते हैं, "उसी समय का यह गीत भी है, 'कातब चरखा, सजन तुहु कात, मिलही एहि से सुरजवा न हो, पिया मत जा पुरूबवा के देसवा न हो. इस गीत में आमतौर पर मज़दूरों की महिलाओं के स्वर को प्रतिध्वनित किया गया. उस समय जब मज़दूर पूरब देस यानी कोलकाता, असम कमाने जाते थे तो उनकी पत्नियां मना करती थीं कि परदेस क्या करने जाना है...घर में ही रहकर चरखा चलाओ, हम भी चलाएंगे, गांधीजी कह रहे हैं कि इससे कमाई भी होगी, सुराज भी आएगा."
लेकिन समय के साथ लोकभाषाओं के ये गीत लोकस्मृति से ग़ायब होने लगे, इन गीतों की झनकार खो गई.
युवा गायिका चंदन तिवारी बीते क़रीब तीन सालों से ऐसे 'गांधी गीतों' को न केवलव इकट्ठा कर रही हैं बल्कि उन्हें संगीत में भी पिरो रही हैं.
अपने इस अभियान सरीखे संगीत के सफ़र को वो कुछ इस तरह बयान करती हैं, "क़रीब तीन साल पहले मैंने वर्धा स्थित महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में पहली बार गांधी से जुड़े गीतों और भजनों को गाया. वहां पर मैंने कैलाश गौतम का लिखा 'सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्‍ही जी/देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्‍ही जी' भी पहली बार गाया. वर्धा में मुझे जो सराहना मिली, उससे मुझे लगा कि गाँधी से जुड़े गीतों पर काम करना चाहिए और फिर ये सिलसिला शुरू हुआ."
चंदन तिवारी बताती हैं, "इसके बाद मैंने मशहूर गांधीवादी दिवंगत अनुपम मिश्र को बिहार के एक प्रसिद्ध गांधीवादी मुरारी शरण का लिखा हुआ नदी गीत सुनाया, नदिया धीरे बहो. यह गीत सुनकर उन्होंने कहा कि तुम लोक गायिका हो, इसलिए तुम गाँधी पर आधारित लोक गीतों को भी ढूंढो. इसके बाद चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष की तैयारी के सिलसिले में मुझे कुछ ऐसे लोकगीत मिल गए. इनमें स्नेहलता के लिखे मैथिली लोकगीत और सुभाष चन्द्र कुशवाहा के लेख में गाँधी जी पर भोजपुरी के महत्वपूर्ण रचनाकार रसूल मियां के कुछ भोजपुरी गीत शामिल हैं. और इस तरह ये सिलसिला आगे बढ़ता गया."
चंदन को अब तक क़रीब ऐसे दो दर्जन गांधी गीत मिले हैं जिनमें से कुछ को इन्होंने ख़ुद ही संगीत में भी ढाला है और बाकी गीतों को भी संगीतबद्ध करने की इनकी तैयारी है.
मोरे चरखा के टूटे न तार, चरखवा चालू रहे... चंदन का सबसे पसंदीदा गीत है. बापू के लोकगीतों का हिस्सा बनने पर महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के सामाजिक अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रोफ़ेसर मनोज कुमार कहते हैं, "गाँधी को उनके जीवन काल में ही एक अवतार मान लिया गया. चंपारण में भी लोगों ने उनको उसी रूप में देखा. उनको एक उद्धारक के रूप में माना गया. इसलिए उनके जीवन काल में ही उनकी मूर्तियां बनीं और वे लोक गीत का भी हिस्सा बने. गाँधी जब तारणहार के रूप में आएंगे तो वे गीत-संगीत में ढलेंगे ही."

Monday, September 24, 2018

बीच समंदर में फंसे भारतीय नाविक को कैसे बचाया गया

पारंपरिक नौकाओं पर अकेले समुद्री यात्रा करते हुए पूरी दुनिया का चक्कर काटकर पूरी होने वाली रेस 'गोल्डन ग्लोब' में हिस्सा ले रहे एक भारतीय नाविक को बचा लिया गया है.
भारतीय नौसेना में कमांडर अभिलाष टॉमी इस रेस में भाग ले रहे थे मगर हिंद महासागर में भीषण तूफ़ान के कारण उनकी नौका क्षतिग्रस्त हो गई और वह ख़ुद भी घायल हो गए थे.
भारतीय नौसेना के मुताबिक उन्हें अब बचा लिया गया है.
अपने याट (पाल वाली नौका) पर अकेले सफ़र कर रहे अभिलाष टॉमी ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी तट से लगभग 3200 किलोमीटर दूर अकेले फंसे हुए थे.
उनके याट का मस्तूल (वह स्तंभ जिससे पाल बंधा रहता है) हिंद महासागर में आए भीषण तूफ़ान के कारण टूट गया था.
वह किसी तरह यह संदेश भेजने में क़ामयाब रहे कि उनकी कमर में गंभीर चोट आई है जिसकी वजह से वह चलने-फिरने और खाने-पीने में असमर्थ थे.
इस रेस के आयोजकों का कहना था कि टॉमी अपनी नौका के अंदर चारपाई पर मजबूर पड़े थे और मदद से इतनी दूर थे कि उनतक पहुंचना बेहद मुश्किल था. लेकिन कोशिशों के बाद उन तक पहुंच बनाई जा सकी और उन्हें सुरक्षित बचा लिया गया है.
उन्हें बचाए जाने से पहले ऑस्ट्रेलिया की मैरीटाइम सेफ़्टी अथॉरिटी के प्रवक्ता ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया था, "अपनी नौका के अंदर वो घायल पड़े हैं और संपर्क स्थापित नहीं कर पा रहे थे."
इसके बाद छलियों की निगरानी करने वाला एक जहाज़ उनकी ओर बढ़ रहा था, जो सोमवार को उन तक पहुंच सका.
ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड आर्मी कॉर्प्स (एएनज़ेडएसी) का एक युद्धपोत, जिस पर हेलिकॉप्टर भी था, अभिलाष की ओर बढ़ रहा था मगर आयोजकों का कहना था कि उसे यहां तक पहुंचने में कम से कम चार दिन लगेंगे.
भारत और ऑस्ट्रेलिया के एक-एक सैन्य विमान रविवार को अभिलाष के याट के ऊपर से उड़े ताकि उनकी हालत का जायज़ा लिया जा सके. मगर विमान क्रू के सदस्य अभिलाष से संपर्क करने में नाक़ामयाब रहे थे. साल के भारतीय नेवी के कमांडर अभिलाष 2013 में समुद्री यात्रा के ज़रिये पूरी दुनिया का चक्कर लगाने वाले पहले भारतीय बने थे.
उनकी नौका का नाम थूरिया है जो 1968 में हुई पहली गोल्डन ग्लोब रेस के विजेता रॉबिन नॉक्स जॉनस्टन की नौका 'सुहैली' की प्रतिकृति है.
उनका सैटेलाइट फ़ोन टूट गया था, ऐसे में वह टेस्टिंग यूनिट के ज़रिये संपर्क साध रहे थे.
शनिवार को अभिलाष ने मेसेज भेजा था, "चलना बेहद मुश्किल है, स्ट्रेचर की ज़रूरत पड़ेगी, चल नहीं सकता, शुक्र है नाव के अंदर सुरक्षित हूं.... सैटलाइट फ़ोन ख़राब है."
टॉमी के पास एक और सैटलाइट फ़ोन था जो कि एक इमरजेंसी बैग में रखा गया था. मगर वो उस बैग तक पहुंच नहीं पा रहे थे.
आयरलैंड के एक प्रतिभागी ग्रेगर मैकगकिन का याट भी तूफ़ान में टूट गया था मगर उन्होंने इसकी मरम्मत कर ली थी.
शुक्रवार को तूफ़ान के कारण 70 नॉट्स की तेज़ हवाएं चली थीं और 14 मीटर ऊंची लहरें उठी थीं. इसी कारण एक अन्य प्रतिभागी मार्क स्लैट्स की नौका दो बार पलट गई थी.
आयोजकों का कहना है कि 11 प्रतिभागी अभी भी रेस में बने हुए हैं. ये लोग उत्तर में थे इस कारण तूफ़ान से बच गए.
गोल्डन ग्लोब रेस एक ऐसी रेस है जिसमें अकेले ही 30 हज़ार मील का यात्रा तय करनी होती है. इसमें सैटेलाइट कम्यूनिकेशन के अलावा और किसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल नहीं किया जाता.
प्रतियोगिता 01 जुलाई को फ्रांस से शुरू हुई थी. अब तक सात नावों को रेस से हटना पड़ा है.
सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के एक महिला की चर्चा गर्म है. यह महिला दुबई में भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट मैच में रविवार को छा गई.
इस महिला के लिए सोशल मीडिया पर कई तरह की फ़ब्तियां कसी जा रही हैं. जैसे- तुम चिकन कोरमा जैसी, मैं कंकड़ वाली दाल प्रिये...एक तुझको पाने की खातिर पाकिस्तान जला डालूं, कोई डायरेक्टर हां कर दो गदर-2 बना डालूं. तुमने न सिर्फ़ मेरा दिल जीता है, किडनी और फेफड़ा भी.
सोशल मीडिया पर ये प्यार भरे अफ़साने कुछ समय पहले प्रिया-प्रकाश की जोड़ी के लिए लिखे जा रहे थे.
भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश मैचों के दौरान कैमरा कई बार इन पर आ कर रुका और फिर क्या था, भारतीय प्रशंसक इनके दीवाने बन गए.
उधर पाकिस्तान मैच हार रहा था और इधर ये महिला भारतीयों का दिल जीत रही थी. इस साल फ़रवरी में कुछ इसी तरह लोग प्रिया-प्रकाश के दीवाने हुए थे.
दुबई में चल रहे मैचों के दौरान ये महिला पाकिस्तान क्रिकेट टीम की हरी जर्सी में दिखी, तो बांग्लादेश के साथ मैच में यह ब्लैक आउटफिट में थी.
लोग अंदाज़ा लगा रहे हैं कि ये महिला क्रिकेट फैन पाकिस्तान की है. कई न्यूज़ वेबसाइटों का दावा है कि इस महिला क्रिकेट फैन का नाम निव्या नवोरा है.
यह भी बताया जा रहा है कि वो सोशल मीडिया पर काफ़ी एक्टिव रहती हैं, पर फ़ेसबुक और ट्विटर पर इनके नाम के कई प्रोफ़ाइल हैं.
कई अकाउंट तो इन दिनों बनाए गए हैं तो कई पहले की बने हुए हैं. सभी पर एशिया कप के दौरान की तस्वीरें शेयर की गई हैं.