Tuesday, November 6, 2018

छह महीने पहले हुआ अपहरण

भारत और अफ़ग़ानिस्तान की सरकारें अपहरण के छह महीने बाद भी इनका पता नहीं लगा सकी हैं. इस कारण इनके परिजन हताश हैं.
मुलिया देवी प्रसादी महतो की पत्नी हैं और वो महीनों से अपने पति के आने का इंतज़ार कर रही हैं. इनकी बेटी ने इसी साल दसवीं की परीक्षा पास की है. मुलिया देवी कहती हैं कि उनकी बेटी ने पढ़ाई छोड़ दी है.
मुलिया देवी कहती हैं, ''हमलोग ग़रीब हैं. मेरे पति इसलिए परदेस गए कि चार पैसा कमा कर बच्चों को ठीक से पढ़ाएंगे-लिखाएंगे. अब उनका पता ही नहीं चल रहा है. हमलोग कैसे ज़िंदा रहें. किस पर भरोसा करें. कौन वापस लाएगा मेरे पति को. अब तो पता ही नहीं चलता कि सरकार उन्हें छुड़ाने के लिए कुछ कर भी रही है या नहीं. मुझे मेरे पति से मिलवा दीजिए.''
प्रसादी महतो के गांव के ही संतोष रजक इस मसले पर मोदी सरकार ने निराश हैं. उनका कहना है कि सरकार अफ़ग़ानिस्तान पर दबाव नहीं बना पा रही है.
महुरी गांव के हुलास महतो अफ़ग़ानिस्तान में अगवा भारतीय मज़दूरों में से एक हैं. यहां उनकी पत्नी प्रमिला देवी की हालत ख़राब होती जा रही है. वो पति के ग़म में ठीक से खा-पी भी नहीं रही हैं. उन्होंने बताया कि बच्चे जब पापा के बारे में पूछते हैं, तो उनके पास कोई जवाब नहीं होता.
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अपहरण के 40 दिन बाद अगवा किए गए मज़दूरों में से तीन की पत्नियों और प्रसादी महतो के बेटे से दिल्ली में मुलाक़ात की थी.
घाघरा गांव के प्रकाश महतो की पत्नी चमेली देवी उस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थीं. उन्होंने बीबीसी को बताया कि विदेश मंत्री ने एक महीने के अंदर सभी का पता लगा लेने का आश्वासन दिया था.
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी पिछले महीने इन मज़दूरों में से कुछ की पत्नियों से रांची में मुलाक़ात की थी. रघुवर दास ने इन्हें एक-एक लाख रुपए की मदद देने की घोषणा की थी, लेकिन यह पैसा अभी तक नहीं मिला है.
उनसे मिलने के बाद प्रमिला देवी ने बताया कि मुख्यमंत्री ने भी उनके अपहृत पति का पता जल्दी ही लगाने की बात कही थी, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ.
प्रवासी समूह के संचालक सिकंदर अली और बगोदर पश्चिम के मुखिया लक्ष्मण महतो ने बताया कि अफ़ग़ानिस्तान में अपहरण के बावजूद इस इलाक़े से मज़दूरों का पलायन नहीं रुका है. यहां बेरोज़गारी बड़ी समस्या है और लोग अभी भी अफ़ग़ानिस्तान जा रहे हैं.
ईरान के यज़्द शहर के रहने वाले साबेरी कहते हैं कि 'मेरे यहां पानी वाले एयर कंडिशनर भी हैं. मगर मुझे यहां, इस क़ुदरती एसी में बैठना पसंद है. ये मुझे पुराने दिनों की याद दिलाता है.'
साबेरी का इशारा बादगीर (हवा पकड़ने वाला) की तरफ़ है. हम उसी के साये तले बैठे हैं.
रेगिस्तान में बसे यज़्द शहर में भयंकर गर्मी पड़ती है. पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है.
इतने गर्म मौसम में चाय का ख़याल आना अजूबा ही होगा.
लेकिन बादगीर के हवादार आंगन में बैठने के बाद तपता सूरज भी मद्धम जान पड़ता है.
इतना आराम मिलता है कि अपने मेज़बान को अलविदा कहने का मन नहीं होता.
यहां बैठ कर आप जब आस-पास की चीज़ों को निहारते हैं, तब एहसास होता है कि इंसान ने इस गर्म माहौल में ख़ुद को सुकून देने की ये तकनीक हज़ारों बरस पहले ही ईजाद कर ली थी.
बादगीर यानी हवा पकड़ने वाले ये ढांचे चिमनी जैसे हैं, जो यज़्द और ईरान के रेगिस्तानी शहरों की पुरानी इमारतों के ऊपर दिखते हैं.
ये ठंडी हवा को पकड़ कर इमारत में नीचे की तरफ़ ले जाने का काम करते हैं. इनकी मदद से मकानों को भी ठंडा किया जाता है.
और उन चीज़ों को बचाने का काम भी होता है, जो गर्मी में ख़राब हो सकती हैं.
तमाम रिसर्च से साबित हुआ है कि बादगीर की मदद से तापमान को दस डिग्री सेल्सियस तक घटाया जा सकता है.
प्राचीन काल में फ़ारस से लेकर, मिस्र, अरब और बेबीलोन की सभ्यताओं तक, ऐसे आर्किटेक्चर को बनाने की कोशिश की गई जो मौसम की मार से बचा सके.
ऐसे ज़्यादाचर ढांचों को क़ुदरती तौर पर हवादार बनाने की कोशिश की गई.
बादगीरों या हवादार ढांचों की ऐसी मिसालें मध्य-पूर्व से लेकर मिस्र और भारत-पाकिस्तान तक देखी जा सकती हैं.
बादगीर, इमारतों के सबसे ऊंचे हिस्से में बने होते हैं. इसलिए इनकी देख-रेख बड़ी चुनौती होती है.
इनकी टूट-फूट का ख़तरा ज़्यादा होता है. ईरान की कई इमारतों के ऊपर बने ये ढांचे यानी बादगीर चौदहवीं सदी तक पुराने हैं.
फ़ारसी कवि नासिर ख़ुसरो की नज़्मों में भी बादगीर का ज़िक्र मिलता है. ये नज़्में तो डेढ़ हज़ार साल पुरानी हैं.
वहीं, मिस्र के लक्सर शहर में ईसा से 1300 साल पुरानी कुछ पेंटिंग मिली हैं.
इन चित्रों में भी बादगीर जैसी संरचनाएं देखने को मिलती हैं.
डॉक्टर अब्दुल मोनिम अल-शोरबागी सऊदी अरब के जेद्दा स्थित इफ़त यूनिवर्सिटी में आर्किटेक्चर और डिज़ाइन के प्रोफ़ेसर हैं.
डॉक्टर शोरबागी कहते हैं कि मध्य-पूर्व के देशों से लेकर, पाकिस्तान और सऊदी अरब तक बादगीर मिलते हैं.
ये इराक़ के अब्बासी ख़लीफ़ाओं के दौर के महलों की चौकोर इमारतों से मिलते-जुलते हैं.
ये महल इराक़ के उखैदर इलाक़े में आठवीं सदी में बनाए गए थे.
वैसे एक थ्योरी ये भी है कि बादगीर का विकास अरब देशों में हुआ. जब अरबों ने ईरान पर जीत हासिल की, तो उनके साथ ये फ़ारस भी पहुंचा.
यज़्द शहर की ज़्यादातर इमारतों पर बने ये बादगीर आयताकार हैं. चारों तरफ़ हवा आने के लिए खांचे बने हुए हैं.
लेकिन स्थानीय लोग बताते हैं कि छह और आठ मुंह वाले बादगीर भी मिलते हैं.
यज़्द की पुरानी इमारत में चलने वाले एक कैफ़े के कर्मचारी मोइन कहते हैं कि, 'बादगीर में हर दिशा से आने वाली हवा पकड़ने के लिए खांचे बने होते हैं. जबकि यज़्द से कुछ दूर स्थित क़स्बे मेबूद में सिर्फ़ एक तरफ़ खांचे वाले बादगीर मिलते हैं क्योंकि वहां तो एक ही तरफ़ से हवा आती है.'
बादगीर के ढांचे को ऐसे बनाया गया है जो वातावरण की हवा को खींचकर संकरे रास्तों से होते हुए नीचे की तरफ़ ले जाता है.
ठंडी हवा के दबाव से गर्म हवा इमारत के बाहर निकल जाती है.
इस हवा के निकलने के लिए बादगीर के उल्टी तरफ़ एक खिड़की जैसी जगह खोली जाती थी.
अगर ठंडी हवा नहीं भी बह रही होती, तो भी बादगीर गर्म हवा पर दबाव बनाकर उसे धकेल कर घर से बाहर निकालने का काम करता था.
इससे घर के भीतर ठंडक बनी रहती थी.

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