केंद्र और यूपी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए वो कहते हैं, ''हमने क़र्ज़माफ़ी की. मोदी जी के नेतृत्व में काफी काम हुआ है. यूरिया की कालाबाज़ारी रुकी है. किसानों के लिए सरकार काफी गंभीर है. सालों से
उपेक्षित पड़े किसानों को हमने राहत देने की कोशिश की है. किसानों को भारी
राहत मिली है.''
कांग्रेस के रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट किया, ''लाठी गोली की है भरमार. किसानों से बर्बरता पूर्ण व्यवहार, बदलेंगी ऐसी मोदी सरकार!''
इस ख़बर को लिखे जाने तक कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह की तरफ से ट्विटर पर कोई ट्वीट नहीं किया गया है.
हालांकि गांधी जयंती और लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिन पर 'जय जवान, जय किसान' के ट्वीट कृषि मंत्री की फीड में देखे जा सकते हैं. की उम्र पार कर चुकीं हरियाणा की सोनबरी किसान यूनियन से हैं. वो कहती हैं, ''म्हारा कई महीने का पेमेंट रुक रहा है. बिजली का बिल घटाने की बजाय बढ़ा दिया. हम हटेंगे नहीं. दिल्ली जाए बिना मानेंगे नहीं. हर साल छूट मिलती थी, इस साल छूट भी नहीं मिली.''
किसान रैली में आए भूपेंद्र प्रधान कहते हैं, ''झूठ बोलने के अलावा कोई काम नहीं है. किसानों का शोषण करते हैं. हम इस सरकार को बिल्कुल पसंद नहीं करते. हम तो सरकार के भंडे कर देंगे.''
पंजाब से आए सुरजीत सिंह कहते हैं, ''मोदी सरकार ने जो वादे किए थे, वो पूरा नहीं किया. कर्जमाफी का वादा किया था, वो पूरा नहीं हुआ, पंजाब में हर रोज़ पांच किसानों की मौत होती है. गन्ना के बकाया तक नहीं चुकाया.''अपना हक लेकर रहेंगे' नारा लगाते इन किसानों की शिकायतों का अंबार रुकता नहीं है. जिला मुज़फ्फरनगर से आए मंजोत सिंह कहते हैं, ''ऐसी लुटाई वाली सरकार आज़ादी के बाद कभी नहीं आई. बिजली के बिल इतने बढ़ा दिए. यूपी का जो मुख्यमंत्री है, इनने ज़्यादा थका लिया. मोदी-योगी की जोड़ी है. बेइमान इकट्ठे हो रहे हैं.''
पास खड़े कई किसान भी कहते हैं, ''शांतिपूर्वक अपनी बात रखने आए थे. रबड़ की गोलियां चला रहे हैं, पानी की बौछार कर रहे हैं. अरे सीने पे गोली चला रहे हैं. बताओ. अपनी गाल बजाई में लगे रहे हैं. बीते चुनाव में इसी मोदी को वोट दिया था जिनको भाजपा भी लिखना नहीं आता था, उनको वोट दे देकर जिताया. अब आने दो 2019, सबक सिखा देंगे. इनका ऐसा बिगुल बजाएंगे कि याद रखेंगे.''
चार साल पहले देश में गांधी जयंती को स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ था. चार साल बाद इस अभियान की एक तस्वीर यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर किसान रैली से लौटते हुए मिलती है.
जहां स्वच्छ भारत अभियान स्टिकर के आस-पास किसानों के झंडे गिरे पड़े हुए हैं और पानी के टैंक से पानी पीते पुलिसवाले कहते हैं- अरे हम भी ड्यूटी कर रहे हैं और ये भी, कोई दुश्मन थोड़ी हैं. रात को हम भी घर चले जाएंगे और ये भी.
इसके बाद किसान नेताओं का और मैं इस पुलिसवाले का आश्वासन लेकर लौटने की ओर बढ़ चलते हैं.
"उस दौर में भोजपुरी का यह गीत बहुत मशहूर हुआ, मोरे चरखा के टूटे न तार, चरखवा चालू रहे. गान्ही बाबा बनलै दुलहवा, अरे दुल्हिन बनी सरकार, चरखवा चालू रहे...."
"उस ज़माने में गांवों में यह मशहूर विवाह गीत बन गया था जिसमें गांधी जी को दूल्हा बनाया गया और अंग्रेज़ों को बाराती."
निराला कहते हैं, "उसी समय का यह गीत भी है, 'कातब चरखा, सजन तुहु कात, मिलही एहि से सुरजवा न हो, पिया मत जा पुरूबवा के देसवा न हो. इस गीत में आमतौर पर मज़दूरों की महिलाओं के स्वर को प्रतिध्वनित किया गया. उस समय जब मज़दूर पूरब देस यानी कोलकाता, असम कमाने जाते थे तो उनकी पत्नियां मना करती थीं कि परदेस क्या करने जाना है...घर में ही रहकर चरखा चलाओ, हम भी चलाएंगे, गांधीजी कह रहे हैं कि इससे कमाई भी होगी, सुराज भी आएगा."
लेकिन समय के साथ लोकभाषाओं के ये गीत लोकस्मृति से ग़ायब होने लगे, इन गीतों की झनकार खो गई.
युवा गायिका चंदन तिवारी बीते क़रीब तीन सालों से ऐसे 'गांधी गीतों' को न केवलव इकट्ठा कर रही हैं बल्कि उन्हें संगीत में भी पिरो रही हैं.
अपने इस अभियान सरीखे संगीत के सफ़र को वो कुछ इस तरह बयान करती हैं, "क़रीब तीन साल पहले मैंने वर्धा स्थित महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में पहली बार गांधी से जुड़े गीतों और भजनों को गाया. वहां पर मैंने कैलाश गौतम का लिखा 'सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी/देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्ही जी' भी पहली बार गाया. वर्धा में मुझे जो सराहना मिली, उससे मुझे लगा कि गाँधी से जुड़े गीतों पर काम करना चाहिए और फिर ये सिलसिला शुरू हुआ."
चंदन तिवारी बताती हैं, "इसके बाद मैंने मशहूर गांधीवादी दिवंगत अनुपम मिश्र को बिहार के एक प्रसिद्ध गांधीवादी मुरारी शरण का लिखा हुआ नदी गीत सुनाया, नदिया धीरे बहो. यह गीत सुनकर उन्होंने कहा कि तुम लोक गायिका हो, इसलिए तुम गाँधी पर आधारित लोक गीतों को भी ढूंढो. इसके बाद चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष की तैयारी के सिलसिले में मुझे कुछ ऐसे लोकगीत मिल गए. इनमें स्नेहलता के लिखे मैथिली लोकगीत और सुभाष चन्द्र कुशवाहा के लेख में गाँधी जी पर भोजपुरी के महत्वपूर्ण रचनाकार रसूल मियां के कुछ भोजपुरी गीत शामिल हैं. और इस तरह ये सिलसिला आगे बढ़ता गया."
चंदन को अब तक क़रीब ऐसे दो दर्जन गांधी गीत मिले हैं जिनमें से कुछ को इन्होंने ख़ुद ही संगीत में भी ढाला है और बाकी गीतों को भी संगीतबद्ध करने की इनकी तैयारी है.
मोरे चरखा के टूटे न तार, चरखवा चालू रहे... चंदन का सबसे पसंदीदा गीत है. बापू के लोकगीतों का हिस्सा बनने पर महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के सामाजिक अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रोफ़ेसर मनोज कुमार कहते हैं, "गाँधी को उनके जीवन काल में ही एक अवतार मान लिया गया. चंपारण में भी लोगों ने उनको उसी रूप में देखा. उनको एक उद्धारक के रूप में माना गया. इसलिए उनके जीवन काल में ही उनकी मूर्तियां बनीं और वे लोक गीत का भी हिस्सा बने. गाँधी जब तारणहार के रूप में आएंगे तो वे गीत-संगीत में ढलेंगे ही."
कांग्रेस के रणदीप सिंह सुरजेवाला ने ट्वीट किया, ''लाठी गोली की है भरमार. किसानों से बर्बरता पूर्ण व्यवहार, बदलेंगी ऐसी मोदी सरकार!''
इस ख़बर को लिखे जाने तक कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह की तरफ से ट्विटर पर कोई ट्वीट नहीं किया गया है.
हालांकि गांधी जयंती और लाल बहादुर शास्त्री के जन्मदिन पर 'जय जवान, जय किसान' के ट्वीट कृषि मंत्री की फीड में देखे जा सकते हैं. की उम्र पार कर चुकीं हरियाणा की सोनबरी किसान यूनियन से हैं. वो कहती हैं, ''म्हारा कई महीने का पेमेंट रुक रहा है. बिजली का बिल घटाने की बजाय बढ़ा दिया. हम हटेंगे नहीं. दिल्ली जाए बिना मानेंगे नहीं. हर साल छूट मिलती थी, इस साल छूट भी नहीं मिली.''
किसान रैली में आए भूपेंद्र प्रधान कहते हैं, ''झूठ बोलने के अलावा कोई काम नहीं है. किसानों का शोषण करते हैं. हम इस सरकार को बिल्कुल पसंद नहीं करते. हम तो सरकार के भंडे कर देंगे.''
पंजाब से आए सुरजीत सिंह कहते हैं, ''मोदी सरकार ने जो वादे किए थे, वो पूरा नहीं किया. कर्जमाफी का वादा किया था, वो पूरा नहीं हुआ, पंजाब में हर रोज़ पांच किसानों की मौत होती है. गन्ना के बकाया तक नहीं चुकाया.''अपना हक लेकर रहेंगे' नारा लगाते इन किसानों की शिकायतों का अंबार रुकता नहीं है. जिला मुज़फ्फरनगर से आए मंजोत सिंह कहते हैं, ''ऐसी लुटाई वाली सरकार आज़ादी के बाद कभी नहीं आई. बिजली के बिल इतने बढ़ा दिए. यूपी का जो मुख्यमंत्री है, इनने ज़्यादा थका लिया. मोदी-योगी की जोड़ी है. बेइमान इकट्ठे हो रहे हैं.''
पास खड़े कई किसान भी कहते हैं, ''शांतिपूर्वक अपनी बात रखने आए थे. रबड़ की गोलियां चला रहे हैं, पानी की बौछार कर रहे हैं. अरे सीने पे गोली चला रहे हैं. बताओ. अपनी गाल बजाई में लगे रहे हैं. बीते चुनाव में इसी मोदी को वोट दिया था जिनको भाजपा भी लिखना नहीं आता था, उनको वोट दे देकर जिताया. अब आने दो 2019, सबक सिखा देंगे. इनका ऐसा बिगुल बजाएंगे कि याद रखेंगे.''
चार साल पहले देश में गांधी जयंती को स्वच्छ भारत अभियान शुरू हुआ था. चार साल बाद इस अभियान की एक तस्वीर यूपी-दिल्ली बॉर्डर पर किसान रैली से लौटते हुए मिलती है.
जहां स्वच्छ भारत अभियान स्टिकर के आस-पास किसानों के झंडे गिरे पड़े हुए हैं और पानी के टैंक से पानी पीते पुलिसवाले कहते हैं- अरे हम भी ड्यूटी कर रहे हैं और ये भी, कोई दुश्मन थोड़ी हैं. रात को हम भी घर चले जाएंगे और ये भी.
इसके बाद किसान नेताओं का और मैं इस पुलिसवाले का आश्वासन लेकर लौटने की ओर बढ़ चलते हैं.
बापू का बिहार के चंपारण से ख़ास रिश्ता रहा है. यहां आकर महात्मा गांधी ने जब सत्याग्रह शुरू किया तो तब
इसका असर न केवल तत्कालीन राजनीति और समाज पर पड़ा बल्कि इसने अलग-अलग
भाषाओं के लोकगीतों पर भी असर डाला.
पत्रकार निराला बताते हैं, "ये
असर दो तरह से सामने आया. पारंपरिक लोकगीतों जैसे- विवाह गीत, सोहर, पुरबी,
कजरी में महात्मा गाँधी शामिल होने लगे और दूसरा ये कि उस समय की लोकबोली
के रचनाकार गांधी पर अलग-अलग तरीक़े से गीत लिखने लगे. ऐसा सिर्फ़ चंपारण
की धरती पर नहीं हुआ, दूसरी बोलियों में भी हुआ. लोकगीतों की दुनिया में
ऐसा ही होता है." "उस दौर में भोजपुरी का यह गीत बहुत मशहूर हुआ, मोरे चरखा के टूटे न तार, चरखवा चालू रहे. गान्ही बाबा बनलै दुलहवा, अरे दुल्हिन बनी सरकार, चरखवा चालू रहे...."
"उस ज़माने में गांवों में यह मशहूर विवाह गीत बन गया था जिसमें गांधी जी को दूल्हा बनाया गया और अंग्रेज़ों को बाराती."
निराला कहते हैं, "उसी समय का यह गीत भी है, 'कातब चरखा, सजन तुहु कात, मिलही एहि से सुरजवा न हो, पिया मत जा पुरूबवा के देसवा न हो. इस गीत में आमतौर पर मज़दूरों की महिलाओं के स्वर को प्रतिध्वनित किया गया. उस समय जब मज़दूर पूरब देस यानी कोलकाता, असम कमाने जाते थे तो उनकी पत्नियां मना करती थीं कि परदेस क्या करने जाना है...घर में ही रहकर चरखा चलाओ, हम भी चलाएंगे, गांधीजी कह रहे हैं कि इससे कमाई भी होगी, सुराज भी आएगा."
लेकिन समय के साथ लोकभाषाओं के ये गीत लोकस्मृति से ग़ायब होने लगे, इन गीतों की झनकार खो गई.
युवा गायिका चंदन तिवारी बीते क़रीब तीन सालों से ऐसे 'गांधी गीतों' को न केवलव इकट्ठा कर रही हैं बल्कि उन्हें संगीत में भी पिरो रही हैं.
अपने इस अभियान सरीखे संगीत के सफ़र को वो कुछ इस तरह बयान करती हैं, "क़रीब तीन साल पहले मैंने वर्धा स्थित महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में पहली बार गांधी से जुड़े गीतों और भजनों को गाया. वहां पर मैंने कैलाश गौतम का लिखा 'सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी/देस बंटत हौ, जइसे हरदी धान बंटत हौ, गान्ही जी' भी पहली बार गाया. वर्धा में मुझे जो सराहना मिली, उससे मुझे लगा कि गाँधी से जुड़े गीतों पर काम करना चाहिए और फिर ये सिलसिला शुरू हुआ."
चंदन तिवारी बताती हैं, "इसके बाद मैंने मशहूर गांधीवादी दिवंगत अनुपम मिश्र को बिहार के एक प्रसिद्ध गांधीवादी मुरारी शरण का लिखा हुआ नदी गीत सुनाया, नदिया धीरे बहो. यह गीत सुनकर उन्होंने कहा कि तुम लोक गायिका हो, इसलिए तुम गाँधी पर आधारित लोक गीतों को भी ढूंढो. इसके बाद चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष की तैयारी के सिलसिले में मुझे कुछ ऐसे लोकगीत मिल गए. इनमें स्नेहलता के लिखे मैथिली लोकगीत और सुभाष चन्द्र कुशवाहा के लेख में गाँधी जी पर भोजपुरी के महत्वपूर्ण रचनाकार रसूल मियां के कुछ भोजपुरी गीत शामिल हैं. और इस तरह ये सिलसिला आगे बढ़ता गया."
चंदन को अब तक क़रीब ऐसे दो दर्जन गांधी गीत मिले हैं जिनमें से कुछ को इन्होंने ख़ुद ही संगीत में भी ढाला है और बाकी गीतों को भी संगीतबद्ध करने की इनकी तैयारी है.
मोरे चरखा के टूटे न तार, चरखवा चालू रहे... चंदन का सबसे पसंदीदा गीत है. बापू के लोकगीतों का हिस्सा बनने पर महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के सामाजिक अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रोफ़ेसर मनोज कुमार कहते हैं, "गाँधी को उनके जीवन काल में ही एक अवतार मान लिया गया. चंपारण में भी लोगों ने उनको उसी रूप में देखा. उनको एक उद्धारक के रूप में माना गया. इसलिए उनके जीवन काल में ही उनकी मूर्तियां बनीं और वे लोक गीत का भी हिस्सा बने. गाँधी जब तारणहार के रूप में आएंगे तो वे गीत-संगीत में ढलेंगे ही."
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